महाराणा प्रताप के कारण

जानिए महाराणा प्रताप के कारण क्यों आँसू नही रोक पाया बादशाह अकबर !

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महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 1540,कुम्भलगढ़ किले मे हुआ था , कद 7.5 लंबा, वजन 110 किलो, 80 किलो के कुंडल और कवच , 25 किलो की 2 तलवार , एक खूबसूरत और सबसे प्रिय अश्व नाम चेतक…लगभग 110 किलो वजन लेकर महा राणा प्रताप युद्ध के मैदान मे वीरता से लड़ते थे।

महाराणा प्रताप और उनके घोड़े पर प्रचलित कविता ” राणबीच चौकड़ी भर भर के चेतक बन गया निराला था, राणा प्रताप के घोड़े से पड़ गया हवा का पाला था ” ये बताती है की प्रताप कितने वीर और महान योध्दा थे और चेतक से उनका एक अनोखा रिश्ता था, चेतक भी वीर अश्व की गिनती मे अव्वल है।

महाराणा प्रताप को ऐसे ही वीर नही कहा जाता है किसी के आगे ना झुकना एवं वीरता से सामना इनके खून मे था, अकबर तक प्रताप के सामने कमज़ोर पड़ गया था। महाराणा प्रताप के शासनकाल में सबसे रोचक तथ्य यह है कि मुगल सम्राट अकबर बिना युद्ध के प्रताप को अपने अधीन लाना चाहता था। 

अकबर ने प्रताप को समझाने के लिए चार राजदूत नियुक्त किए जिसमें सर्वप्रथम सितम्बर 1572 ई. में जलाल खाँ प्रताप के खेमे में गया, इसी क्रम में मानसिंह (1573 ई. में ), भगवानदास ( सितम्बर, 1573 ई. में ) तथा राजा टोडरमल ( दिसम्बर,1573 ई. ) प्रताप को समझाने के लिए पहुँचे, लेकिन राणा प्रताप ने चारों को निराश किया, इस तरह राणा प्रताप ने मुगलों की अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया जिसके परिणामस्वरूप हल्दी घाटी का ऐतिहासिक युद्ध हुआ।

मात्र 56 वर्ष की आयु मे 19 जनवरी 1597, चवंद मे महाराणा प्रताप का निधन हो गया। प्रताप के निधन से अकबर भी अपने आँसू ना रोक पाया…. महाराणा प्रताप की मृत्यु पर अकबर को बहुत ही दुःख हुआ क्योंकि ह्रदय से वो महाराणा प्रताप के गुणों का प्रशंसक था और अकबर जनता था की महाराणा जैसा वीर कोई नहीं है इस धरती पर। यह समाचार सुन अकबर रहस्यमय तरीके से मौन हो गया और उसकी आँख में आंसू आ गए।

महाराणा प्रताप के स्वर्गावसान के समय अकबर लाहौर में था और वहीं उसे सूचना मिली कि महाराणा प्रताप की मृत्यु हो गई है। अकबर की उस समय की मनोदशा पर अकबर के दरबारी दुरसा आढ़ा ने राजस्थानी छंद में जो विवरण लिखा वो कुछ इस तरह है:-

अस लेगो अणदाग पाग लेगो अणनामी
गो आडा गवड़ाय जीको बहतो घुरवामी
नवरोजे न गयो न गो आसतां नवल्ली
न गो झरोखा हेठ जेठ दुनियाण दहल्ली
गहलोत राणा जीती गयो दसण मूंद रसणा डसी
निसा मूक भरिया नैण तो मृत शाह प्रतापसी


अर्थात् –


हे गेहलोत ! राणा प्रतापसिंघ तेरी मृत्यु पर शाह यानि सम्राट ने दांतों के बीच जीभ दबाई और निश्वास के साथ आंसू टपकाए। क्योंकि तूने कभी भी अपने घोड़ों पर मुगलिया दाग नहीं लगने दिया।

तूने अपनी पगड़ी को किसी के आगे झुकाया नहीं, हालांकि तू अपना आडा यानि यश या राज्य तो गंवा गया लेकिन फिर भी तू अपने राज्य के धुरे को बांए कंधे से ही चलाता रहा। तेरी रानियां कभी नवरोजों में नहीं गईं और ना ही तू खुद आसतों यानि बादशाही डेरों में गया। तू कभी शाही झरोखे के नीचे नहीं खड़ा रहा और तेरा रौब दुनिया पर निरंतर बना रहा। इसलिए मैं कहता हूं कि तू सब तरह से जीत गया और बादशाह हार गया।

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