हिन्दी माँ का जन्मदिवस

व्यंग्य : हिन्दी माँ का जन्मदिवस

युवा विचार

हिन्दी माँ का जन्मदिवस : आज दुर्भाग्य से मैं प्रातः 7 बजे ही उठ गया। सर्वप्रथम अपने दाहिने हाथ से दाहिनी आँख मली, फिर बायें हाँथ से अपना मोबाइल उठाया और सीधे फेसबुक पर लैंड कर गया। लैंड करते ही मैंने देखा कि लोग धका-धक हिन्दी दिवस की बधाई और शुभकामनाएं दे रहे हैं। मैं भी अपने अँगूठे को बिना आराम दिए टका-टक सभी हिन्दी वरद पुत्रों की पोस्ट पढ़ने लगा । एका-एक मेरी नजर एक कवि महोदय की पोस्ट पर पड़ी। जिसमें लिखा था “हमारी सबसे खूबसूरत माँ हिन्दी के जन्मदिवस की आप सभी को बधाई हो।”

मेरे मुँह से भक्कक से निकला- *जन्मदिवस* अरे ! ये तो मुझे भी नहीं पता था। हिन्दी दिवस की इस ऐतिहासिक बधाई को पढ़ते ही मेरा दिमाग झन्ना गया, फिर सोंचा यार इतना हैंडसम कवि लिख रहा है , और अन्य कवि भी टिप्पड़ी में बधाई दे रहे हैं तो सच ही होगा। लेकिन फिर दिमाग में आया कि पहला हिन्दी दिवस तो 1953 में मनाया गया, तो क्या मेरी हिंदी माता की उम्र केवल 67 साल ही है। मैं तो हजार साल मान के चल रहा था।

ये उधेड़बुन चल ही रही थी कि आदिकाल, भक्तिकाल, रीतिकाल ,आधुनिक काल ये सारे काल मिलकर मुझे रिकॉल करने लगे। गंग कवि, जायसी , सूरदास, मीराबाई , रसखान , बिहारी ,कबीर , हरिश्चंद्र, प्रेमचन्द इन सभी महानुभावों की आत्माएं एक-एक कर मेरी आँखों के सामने प्रकट होने लगीं। मैं उन्हें देख कर मुस्कराने लगा। मन किया कि कुछ पूंछू , पर हिम्मत नहीं हुई। किन्तु फिर किसी तरह अपना साहस जुटाया और हरिश्चन्द्र जी की आत्मा से अपना सवाल दाग ही दिया। मैंने पूँछा कि आप कौन सी भाषा में लिखते थे श्रीमान! वो तपाक से बोले-“क्यों रे अनपढ़ ! तुझे ये भी पता नहीं कि मैं हिंदी में लिखता था! ”

हिंदी मेरी मां है

मैंने कहा हिन्दी में लिखते थे ? हे हे हे… ऐसा हो ही नहीं सकता श्रीमान। उन्होंने थोड़ा और गुस्से में कहा -“क्यों बे? मजाक समझ रहा है तू!” मैंने तुरन्त उन्हीं कवि की फेसबुक पोस्ट भारतेन्दु जी को दिखाई और बड़े रौब से कहा ये देखिए प्रमाण।और कहा हैंडसम के साथ साथ कवि भी है महोदय। अभी कुछ दिन पहले ही नामी पत्रिका में छपा है। इस कवि ने हिन्दी के जन्मदिवस की बधाई दी है। इसलिए कैसे मैं आपकी बात मान लूँ…

आपको पता नहीं कि पहला हिन्दी दिवस तो 1953 में मनाया गया था। और आप तो 1885 में ही शरीर त्याग दिए थे, उस समय हिन्दी कहाँ थी। फिर भी आप इतना काहे फेंक रहे हैं कि हम हिन्दी में लिखते थे।

मेरा इतना कहना ही था कि भारतेन्दु जी के साथ सभी कवि आत्माओं ने मुझपर लात घूसे बरसाना शुरू कर दिया। उनके अप्रत्याशित आक्रमण से मैं सदमे में हूँ। यह आपबीती सुनाने तक भी मेरा दर्द अभी कम नहीं हुआ है। इसलिये दर्द भरी आवाज में ही आप सभी को हिन्दी दिवस की बधाई देता हूँ।

 

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