असम में मदरसों पर क्यों जड़ने वाला है ताला ?

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असम राज्य माध्यमिक स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा शिक्षा निदेशालय को भेजी गई अधिसूचना के अनुसार राज्य सरकार ने सभी मदरसे बंद करने का निर्णय लिया है। अधिसूचना में मदरसों के सभी अनुबंध शिक्षकों को सामान्य उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों में स्थानांतरित करने का प्रस्ताव दिया गया है और कहा गया है कि इस प्रक्रिया को जल्द से जल्द शुरू किया जाना चाहिए।

सरकार ने कहा हैं कि धार्मिक तर्ज पर चलने वाले किसी भी शैक्षणिक संस्थान को राज्य सरकार संरक्षण नहीं देगी। राज्यभर में स्थित सभी मदरसों और संस्कृत संस्थानों को इस साल नवंबर से बंद कर दिया जाएगा। इसलिए मदरसों को बंद करने से नए अरबी शिक्षकों को नियुक्त करना संभव नहीं होगा। शिक्षामंत्री सरमा ने कहा कि निजी तौर पर चलने वाला खेरसी मदरसा जारी रहेगा।

मंत्री ने पहले घोषणा की थी कि मदरसा बोर्ड को भंग कर दिया जाएगा और संस्थानों के शिक्षाविदों को माध्यमिक शिक्षा बोर्ड को सौंप दिया जाएगा। फरवरी 2020 में एक महत्वपूर्ण निर्णय में लिया था जिसमे असम सरकार ने घोषणा की थी कि सरकार सभी राज्य संचालित मदरसों और संस्कृत संस्थानों को बंद कर रही है।

 

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सरमा ने उस समय कहा था कि धार्मिक उद्देश्यों के लिए धर्म, धार्मिक शास्त्र, अरबी और अन्य भाषाओं को पढ़ाना सरकार का काम नहीं है। मंत्री ने विशेष रूप से उल्लेख किया कि राज्य सरकार के अधीन सभी धार्मिक स्कूल बंद रहेंगे। गैर सरकारी संगठनों द्वारा संचालित मस्जिदों और संस्कृत विद्यालयों द्वारा संचालित मदरसों को फैसले से कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
अल्पसंख्यक छात्र संघ के सलाहकार अजीजुर रहमान ने भाजपा पर आरोप लगाया कि मदरसे केवल असम में नहीं है पूरे भारत में है और अब सरकार मदरसों को बंद कर रही हैं। यह एक पक्षपातपूर्ण निर्णय है क्योंकि भाजपा एक सांप्रदायिक पार्टी है, इसलिए चुनाव से पहले ध्रुवीकरण उनकी प्राथमिकता है। वे बहुत अच्छी तरह से जानते हैं कि अल्पसंख्यक संगठन इस कदम का विरोध करेंगे, जो उन्हें विधानसभा चुनाव से पहले मतदाताओं को ध्रुवीकृत करने का मौका देगा।

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