बिहार में नीतीश कुमार क्यों हैं बीजेपी की मजबूरी?

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बिहार चुनाव के नतीजे घोषित हो गए हैं।एनडीए में शामिल बीजेपी ने 74 सीटों पर, जेडीयू ने 43 सीटों पर, विकासशील इंसान पार्टी ने 4 सीटों पर और हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा ने भी 4 सीटों पर जीत दर्ज की है। बिहार में बीजेपी अभी तक छोटे भाई के रोल में नज़र आयी थी लेकिन इस बार उसका कद बढ़ गया है जनता ने जेडीयू से ज्यादा भाजपा पर विश्वास जताया है लेकिन इसके बावजूद भी बीजेपी के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है।सबसे पहला कारण तो यही है कि नीतीश सत्ता के लिए जब राजद से एक बार हाथ मिला सकता है तो उसे दोबारा हाथ मिलाने में कोई समस्या नहीं होगी। वो यह भी कह देगा, “राजनीति में कोई भी स्थाई दुश्मन नहीं होता।”

16 लोकसभा सांसद हैं जदयू के, भले ही सारे नरेन्द्र मोदी के कारण गए हों, लेकिन अब पाँच साल के लिए तो वही हैं। नीतीश बिहार में भाजपा को सत्ता से बाहर तो कर ही सकते हैं, बल्कि केन्द्र में भी दुखदायी समस्या बन सकते हैं। इसलिए, भले ही त्वरित निवारण सही न हो, पर 69 साल के नीतीश को शांत रखना भाजपा की विवशता कह सकते हैं।

अब सवाल यह है कि भाजपा विवश क्यों है? क्योंकि भले ही जे पी नड्डा खूब बड़े रणनीतिकार हों, लेकिन बिहार का सत्य यही है कि केन्द्र को चालीस सांसद से मतलब है, जो कि बिहार से मिल रहा है। उसके अलावा बिहार, केन्द्र सरकार को कुछ खास वापस नहीं करता, बल्कि हमेशा ‘विशेष पैकेज’ का रोना रोता रहता है। ऐसे राज्य पर बीजेपी की कोई खास नजर है भी नहीं।

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नीतीश और सुशील मोदी दोनों से बीजेपी को सीटों का घाटा ही हुआ है, लाभ नहीं।इसलिए, इन दोनों को कूटनीति से ही हटाना होगा। नीतीश को पाँच अंतिम साल और। नीतीश ने स्वयं ही कहा है कि वो अंतिम बार लड़ रहे हैं, हो सकता है कि आगे पलट जाएँ, अतः भाजपा को उसके लिए भी तैयार रहना चाहिए।कहा जाता है कि भाजपा अध्यक्ष जे पी नड्डा के पास भाजपा बिहार के नेता यह समस्या ले कर गए थे कि नीतीश को मुख्यमंत्री न बनाया जाए। नड्डा ने विचार करने के बाद अमित शाह से चर्चा की, अमित शाह भी सहमत दिखे। फिर बात प्रधानमंत्री मोदी तक पहुँची, जिन्होंने पंद्रह मिनट में इस बात को खारिज कर दिया कि नीतीश मुख्यमंत्री नहीं बनेंगे।

सीधा निर्देश यह था कि भाजपा का कोई भी नेता या प्रवक्ता नीतीश से इतर कोई बात न करे। इसीलिए, आपको परिणाम वाले दिन हर प्रवक्ता ‘नीतीश जी ही मुख्यमंत्री बनेंगे’ कहता दिखा। क्योंकि नीतीश किस स्तर के ‘मूडियल/ईगोइस्ट’ नेता हैं, वो हमने 2014-15 में दो बार देख लिया है जब वो मोदी के नाम से बगावत करने के साथ, बीजेपी बिहार से भी नाता तोड़ कर लालूपुत्र तेजस्वी के साथ चले गए।बीजेपी को बिहार में जमने के लिए इन पाँच सालों में जमीनी स्तर पर संगठनात्मक कार्य करने होंगे। नीतीश के अगले पाँच साल जो भी रहें, बीजेपी के लोगों को 2024 और 2025 में अकेले चुनाव लड़ने की तैयारी अभी से करनी चाहिए। साथ ही नीतीश का विकल्प ढूंढ लेना चाहिए।

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