लता जी

जब लता जी इस दुनिया से गई तो वक्त थम सा गया !

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  • कौशल सिखौला


रविवार को देश जब लताजी के शोक में डूबा हुआ था, तब माहौल बहुत भारी था। यह सच है कि देश चल रहा था, दुनिया चल रही थी, पर वक्त थम गया था। शब्द जब जवाब दे जाएं तो समझिए कि कष्ट बहुत वजनी है। कोई मामूली बात नहीं है लताजी का जाना। कोई एक पीढ़ी नहीं, तमाम पीढ़ियाँ हैं जो लताजी से हदों के पार तक जुड़ी हैं। लता होना बहुत मुश्किल है, लता के बगैर होना नामुमकिन है। बेशक उनकी पार्थिव देह पंचतत्वों में विलीन हो गई हो, वे सदा जियेंगी, युग युगान्तर तक जियेंगी। लताजी की गाथाएं अमर हैं, अनश्वर हैं। उनके गीत देश के आत्म में घुले हैं, देश की माटी में रच गए हैं। भला लता को भी कोई भुलाता है ?

इस महान देश ने महान शोक के अनेक अवसर भोगे हैं। भगतसिंह को जब फांसी हुई , वह भी कोई सुबह होगी जब पूरा देश इसी तरह शोक में डूबा होगा। ऐसी ही घड़ी में गुरु रवींद्रनाथ टैगोर गए होंगे। नेताजी के जाने पर भी देश शोक के महासागर में डूब गया होगा। महात्मा गांधी का महाप्रयाण असीम शोक की कैसी घड़ी लाया होगा। किस किस की जुदाई याद करें , भूले ही कहाँ हैं। इस भारत भूमि ने इतिहास के अनेक अवसान देखे हैं , भोगे हैं। लताजी तक आते आते बहुत कुछ भोगते रहे हैं आप और हम।

देश की थीं लताजी। एक विरासत थीं, मखमली रूहानी आवाज थीं। जन्म से लेकर मृत्यु तक के सभी संस्कारों पर उन्होंने गाया है। वे भाई बहन के प्यार में भी है। विवाह के मांगलिक गीतों में भी हैं, विदाई के दर्द में भी हैं। लता हौसलों में हैं, आत्मबल में हैं, आशा और विश्वास में भी हैं। लौकिक लता अलौकिक हो गईं। शब्द जहां हारते हैं, लताजी का अंतिम सफर वहां से शुरू होता है। होंठ जब सूख जाएं , तब उनकी यात्रा शुरू हो जाती हैं। वे थीं भी, हैं भी और सदा रहेंगी भी।


हिजाब पहनने के अधिकार पर ओवैसी का संविधान वाला कुतर्की अलाप

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स्त्री गायिकाओं में लताजी कभी भी नम्बर वन की कुर्सी से नहीं उतरीं। फिल्मी गायिकाओं में उनके बाद उनकी छोटी बहन आशा भोंसले का नाम रहा है, रहेगा भी। यूँ तो मंगेशकर परिवार ही संगीत का समुद्र था और लताजी की सभी बहनें गाती रहीं। उनसे एकदम मिलती जुलती आवाज सुमन कल्याणपुर की है। हेमलता और शारदा जैसी गायिकाओं ने भी फिल्मी गीत गाये। अनुराधा पौडवाल जबरदस्त गायिका रहीं। लेकिन लताजी जैसा मुकाम कोई हासिल नहीं कर पाईं। लताजी बेहिसाब गुणी थीं। उन्होंने संगीत को सुर ही सुर दिए। वे साक्षात सरगम थीं। पुरुष गायकों में मुहम्मद रफी के साथ गाये उनके युगल गीत इतने मधुर हैं कि दिलकशी भी शर्म खाए। सचमुच स्वरकोकिला थीं लता जी।

उनका जाना बेहद अफसोसजनक हैं। वे 8 जनवरी को अस्पताल गईं, फिर निकल ही नहीं पाईं। संघर्ष तो किया किन्तु उम्र हार गईं। आश्चर्य की बात है कि वे कभी घर से बाहर नहीं जातीं थीं , फिर भी कोरोना उनके घर में पहुँच गया। इस महामारी ने सम्भवतः धरती की सबसे बड़ी भेंट ले ली है। अजीब सा सूनापन कल से फैला हुआ है। मन को कोई और विषय न तो सूझ रहा है और न भा रहा है। पर क्या करें। वे तो परमात्मा में विलीन हो गईं। हम धरती पर हैं तो जीना भी पड़ेगा। लताजी बार बार इस वसुधा पर आएं, सुर सजाएं, गीत गाएं। धरती पर रहते हुए हम सब की यही कामना है।

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