टिबेटन मार्केट

‘टिबेटन मार्केट’ की आड़ में तिब्बती बौद्ध भिक्षुओं ने भारत में चलाया चीन का एजेंडा

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  • राम किशोर बाजपाई

पाकिस्तान के स्थापन की प्रक्रिया में भारत के बहुसंख्यक वर्ग को भीषण आर्थिक, मानसिक शारीरिक व जनशक्ति की क्षति उठानी पड़ी थी। भारत को अपने महत्त्वपूर्ण धार्मिक/आर्धिक रूप से सुदृढ़ व सम्पन्न नगरों व उपजाऊ कृषि भूमि से हाथ धोना पड़ा था। उसके उपरान्त तो यहाँ के बहुसंख्यक समाज को तोड़ते व बाँटते रहने की दिशा में, जाने या अनजाने, कोई कोर कसर नहीं रख छोड़ी गयी थी।

बहु संख्यक समाज जहाँ एक ओर इन समस्याओं से जूझ ही रहा था कि उधर तत्कालीन शासक वर्ग ने, बिना दीर्घावधि सम्भावित समस्याओं का विश्लेषण किये, तिब्बती बौद्ध शरणार्थियों को भारत में बसा लिया। इन शरणार्थियों के कारण देश एक नये प्रकार के संकट से घिर गया। वह था कि देश के पर्वतीय क्षेत्रों में ‘‘टिबेटन मार्केट ‘ स्थापित होते चले गये।

इन ‘टिबेटन मार्केट’ के माध्यम से खुले आम और धड़ल्ले से चीन में निर्मित सामान बिकने लगा। इस प्रकार ये ‘टिबेटन मार्केट’ वास्तविकता में चीन निर्मित सामान के विक्रय केन्द्र बनकर रह गये। क्रमशः इनका कुछ अन्य शहरों में विस्तार होता चला गया।

यही तिब्बती बौद्ध जिनकी भारत सरकार ने कभी चीन के नरसंहार से रक्षा की थी, भारत में चीन निर्मित सामान को खपाने में अपना योगदान देते हुए भारत की अर्थव्यवस्था के साथ खिलवाड़ करने लगे।


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यही नहीं वरन् इन्होंने नेपाल में भी अपने अड्डे स्थापित कर लिये और वामपंथियों को सहयोग देने लगे। वर्तमान में भी देश में चीन निर्मित सामान के विक्रय में इनका योगदान कम नहीं।

अब तो हिमाचल प्रदेश का धर्मशाला इनका तीर्थ बन चुका है…. और ठीक ही है कि इनकी रणनीति से उत्साहित हो कुछ शक्तियाँ, उनका अनुकरण करते हुए, पूरे भारत देश को एक राष्ट्र के रूप में न देखकर एक धर्मशाला के रूप में देखना चाहती हैं।

सच्चाई तो यह है कि कांग्रेस ने कभी इस देश को देश न समझ कर मात्र भूमि का एक टुकड़ा समझा, जबकि यहाँ का बहुसंख्यक समाज इसे अपने पुरुखों की एक पुनीत व पवित्र तपोभूमि मानता रहा और आज भी मान रहा है।

…………… और कांग्रेसी जन अपेक्षा रखते हैं कि , “उनके तत्कालीन नेताओं की ओर कोई उँगली न उठाए…… वे उनके पूजनीय हैं।

 

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