नए उत्तर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष पर फंसा पेंच

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  • प्रमोद शुक्ल


उत्तर प्रदेश में भाजपा अध्यक्ष का पद महीनों से खाली पड़ा है। कम से कम भारतीय जनता पार्टी में लंबे अरसे से यह व्यवस्था रही है कि कोई एक व्यक्ति दो कुर्सी पर नहीं रहेगा। परंतु भाजपा की यह परंपरा भी अब ढीली पड़ती जा रही है। विधानसभा चुनाव के बाद पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह को कैबिनेट मंत्री बना दिया गया था।

कायदे से तो देखा जाए तो उसी समय से भाजपा अध्यक्ष की कुर्सी खाली हो गई थी, हालांकि काफी दिनों तक इस्तीफा नहीं दिया गया इस पद से, परंतु पिछले महीने इस्तीफा हो जाने के बाद भी अभी तक उस पद पर किसी नए प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति नहीं हो पाई है। जी हां, यहां भी अब “नियुक्ति” जैसा ही कुछ होता है। भाजपा में पहले दिखावे के लिए बाकायदा चुनावी औपचारिकता होती थी। अब शायद वह भी नहीं होती है।

इस नियुक्ति में समय काफी लग रहा है। आप कहेंगे कि अनिर्णय की स्थिति है, जी नहीं,, वह कहते हैं कि हम बहुत लोकतांत्रिक हैं। काफी गंभीरता से कई स्तर पर चिंतन मनन के बाद ही कोई महत्वपूर्ण फैसला होता है। (जैसे कि अभी पिछले दिनों नितिन गडकरी और शिवराज सिंह को संसदीय बोर्ड और चुनाव समिति से अवकाश देने का फैसला काफी चिंतन मनन के बाद ही हुआ )

आपने देखा होगा कि असम का मुख्यमंत्री चयन करने में भाजपा को काफी समय लग गया था। लंबे समय तक वह दुविधा में रहे कि कांग्रेस से आए हेमंता विश्वशर्मा जी को कुर्सी सौंपी जाए या नहीं..? “देर आए दुरुस्त आए”। भले ही वह निर्णय थोड़ा देरी से हो पाया परंतु सही निर्णय हुआ। हेमंता जी “फ्री हिटर” साबित हो रहे हैं। दनादन चौके-छक्के लगाकर साबित कर रहे हैं कि वह टेस्ट मैच के प्लेयर तो कतई नहीं थे, वन-डे मैच का प्लेयर भी उनको न माना जाए। 20-20 के मैच के लिए वह ज्यादा फिट नजर आते हैं।

लौटते हैं उत्तर प्रदेश…पार्टी अध्यक्ष के लिए निर्णय पर संभवतः यहां भी ऐसा ही कुछ हो,, “देर आए दुरुस्त आए” वाला निर्णय और यदि ऐसा कुछ “दुरुस्त” निर्णय हुआ तो मेरा मानना है कि श्रीकांत शर्मा एक-दो दिन में प्रदेश अध्यक्ष घोषित कर दिए जाएंगे दरअसल तमाम जातीय गणित तो देखने ही पड़ते हैं,, लेकिन परफारमेंस भी बहुत मायने रखता है, उसे एक सीमा से ज्यादा नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।

श्रीकांत शर्मा ने उत्तर प्रदेश में ऊर्जा मंत्री रहते हुए जो परफॉर्मेंस दिया उसे इस सबसे बड़े सूबे की अधिकांश जनता रोज याद करती है, उनके जाने के बाद आम जनता को बिजली का वह सुख नसीब नहीं हो पा रहा है। हालांकि प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए एक और ‘शर्मा’ के नाम की चर्चा है जो उप मुख्यमंत्री पद से मुक्त हुए हैं,, परंतु जब परफारमेंस की बात आती है तो इस रेस में श्रीकांत शर्मा उनसे बहुत आगे दिखाई पड़ते हैं।

बताया जाता है कि जब स्वतंत्र देव सिंह की नियुक्ति हो रही थी तब और उसके बाद भी नितिन गडकरी ने उत्तर प्रदेश के चुनाव के पहले सुझाव दिया था कि बेहतर होगा यदि केशव मौर्या को पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनाया जाए, उनका सुझाव शायद इसलिए था क्योंकि जातिवादी राजनीति के तहत उनका मानना था कि केशव मौर्य उस पद पर ज्यादा फिट होंगे बजाय स्वतंत्र देव सिंह के, वह सुझाव उस समय तो लागू नहीं हो पाया लेकिन पार्टी के कुछ महत्वपूर्ण लोगों का कहना है कि अब लोकसभा चुनाव के समय यदि केशव मौर्य पार्टी अध्यक्ष रहेंगे तो पार्टी को ज्यादा फायदा मिल सकता है।

बहरहाल फैसला लेने में इसी कारण देरी हो रही है क्योंकि कुछ लोग स्वतंत्र देव सिंह की जगह केशव मौर्या को ज्यादा उपयुक्त बताते रहे हैं, परंतु परफॉर्मेंस के आधार पर बहुतों का कहना है कि यदि श्रीकांत शर्मा जैसों को साइडलाइन किया जाएगा तो फिर कोई भी मंत्री कैसे अपने काम को बहुत उच्च स्तर तक ले जाने की कोशिश कर पाएगा ?

हालांकि ध्यान रहे कि ऐसे फैसलों में सभी को चौंका कर चकरघिन्नी बना देने के मामले में मोदी के फैसले हमेशा सबसे ज्यादा लाजवाब साबित होते रहे हैं, अतः तय मानिए कि “होइहैं वही जो नमो रचि राखा, को करि तर्क बढ़ावैं शाखा”।

 

 

 

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