सद्गुरु

सद्गुरु के बयान पर हल्ला मचाने से पहले उन्हें समझना ज़रूरी

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  • चित्रा अवस्थी


सद्गुरु के हालिया बयान से, जिसमें उन्होंने मंदिरों के बारे में कुछ कहा है, आहत और क्रुद्ध आत्माओं के लिए शांति की प्रार्थना है। इस बारे में कुछ भी कहने से पहले मैं कहना चाहती हूँ कि मैं सद्गुरु की शिष्या, फ़ॉलोअर या फ़ैन कुछ भी नहीं हूँ। हाँ, मैंने उनके बहुत से वीडिओज़ बहुत ध्यान से देखे – सुने हैं, उनके शिष्यों की कुछ किताबें पढ़ी हैं और कुछ से व्यक्तिगत परिचय भी है।

सद्गुरु फ़ाउंडेशन और चैरिटी वर्क के अलावा अपने शिष्यों को साधना कराते हैं, सचमुच की साधना, जिस से व्यक्ति अंदर से बदलता है। सच तो यह है अभी तक सद्गुरु के शिष्यों में वामनुमा कंबख़्ती नहीं मिलती है। उनकी साधना पद्धति शुद्ध भारतीय है। सद्गुरु को वामिओं के बीच राम के सीता परित्याग के प्रसंग की व्याख्या करते सुनिए।ऐसे अनेक प्रसंग हैं, जहां सद्गुरु शांत, संयमित लेकिन अकाट्य तर्कपूर्ण भाषा में व्यर्थ प्रॉपगैंडा को काटते है । सच तो है कि पढ़े- लिखे युवकों को कंट्रोल करने की उनकी क्षमता अद्भुत है। शाकाहार से यौन शुचिता जैसे विषयों में शिक्षित युवाओं से उनका संवाद आँखें खोलने वाला होता है।

व्यर्थ का उग्र प्रताप जितना काम आता है, सद्गुरू का तरीक़ा उस से ज़्यादा ही काम आता है। हमारा धर्म, जो भारत में पनपा, उसका कोई नाम नहीं है, कोई आयरन कास्ट में ढला स्वरूप नहीं है, एकेश्वर और निरीश्वरवाद उसका ही हिस्सा है। वास्तव में हमारे शास्त्रों भी धर्म और अधर्म दो ही शब्द मिलते है, हिंदू या सनातनी कहने की आवश्यकता तो तब पड़ी जब यहाँ बाहर से आए सम्प्रदायों को धर्म का नाम दिया गया। सम्भव है, हम में से बहुतों को उनकी इस तरह की बातें ना समझ आती हों, लेकिन इसलिए उनको ख़ारिज करने का विचार निहायत कुंठित प्रयास है।


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उनके कथित मंदिर वाले वीडिओ को कितने लोगों ने सुनने का प्रयास किया पता नहीं, क्योंकि उसको जिस तरह मीम्ज बना कर वाइरल किया जा रहा है वो सही नहीं है। सद्गुरु ने इंटर्व्यू में कहा है कि लगातार लड़ते रहने का कोई पोईँट नहीं है, ना ही दुनिया भर के असंख्य मंदिरों को रिक्लेम किया जा सकता है, सबसे अच्छा हो कि दोनों पक्ष मिल बैठ कर आपसी सहमति से कुछ मंदिर जिनका भावनात्मक महत्व ज़्यादा है, उनको पुनः मंदिर बना लें।

ये तो है उनकी बात, लेकिन जहां आज भी सैंकड़ों मंदिर बिना पूजा पाठ के खंडहर हो रहे हैं, कोई सुबह – शाम दिया बत्ती नहीं करता, दशरथ महल जैसे अनेक मंदिर में आरती के समय अगर मशीनें ना हों तो घंटा घड़ियाल ना बज पाएँ, वहाँ साठ हज़ार मंदिरों का होगा भी क्या? बनारस में मंदिरों पर दुकान और गेस्ट हाउस बनाने वाले हिंदू भी थे,मंदिरों में पूजा का सामान बेचने में विधर्मीयों को अनुमति और किराए पर दुकान देने वाले हिंदू ही हैं। ऐसे में यह विचार कि जितने मंदिर सम्भालने नहीं उतने का क्या करोगे, धर्मद्रोही नहीं है।

बाक़ी तो स्वामी विवेकानंद को भी Freemasons Society के सदस्य और सनातन का दुश्मन बताने वालों की कमी नहीं है।

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