ब्राह्मणों की सच्चाई

पता नहीं रहीम हम ब्राह्मणों की सच्चाई क्यों नहीं समझ पाए

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  • प्रमोद शुक्ल


ब्राह्मणों की सच्चाई : रहिमन वो नर मर चुके, जो कहीं मांगन जाय

उनसे पहले वो मुए, जिन मुंह निकसत नाहिं।।

रहीम का ये दोहा बहुतों के लिए सही हो सकता है, पर भारत भूमि में ब्राह्मणों की जो मांगने की परंपरा रही है। उस सदर्भ में रहीम लगता है विचार करना भूल गये।

पांच घर मांग कर, जो भी मिले उस पर संतोष करने वाला ब्राह्मण अपना सब कुछ समाज को देने के लिए तत्पर रहता था। ऐसी मान्यता भी रही है कि हाथ पसारने से अहंकार का शमन होता है।


पंजाब को हल्के में मत लीजिए, गंभीर खतरा आ गया है

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इसीलिए आज भी ब्राह्मणों के बालकों का उप-नयन संस्कार होता है तो गुरु उन्हें भिक्षा मांगने भेजता है। भिक्षाटन की ये परंपरा भले ही अब सांकेतिक ही बची हो, पर इस संकेत में भी ये भाव तो छिपा है ही कि हाथ पसारने से अहंकार नष्ट होता है, विनम्रता आती है।

रहीम। हमारी मिट्टी की इस सच्चाई को क्यो नहीं समझ पाए ….पता नहीं !

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