छठ के बारे में

छठ के बारे में बचपन और बड़े होने पर मालूम पड़ी विरोधाभासी बातें

धर्म प्रमुख विषय
  • मेघा मैत्रीय 

 

छठ के बारे में मुझे बचपन में दो बातें मालूम थीं-

  1. यह बाकी त्योहारों से महत्वपूर्ण है क्योंकि मेरे आस-पास के हर मिडल क्लास दोस्त को उनके हिस्से का एक नया कपड़ा छठ पर मिलता था नाकि मेरी तरह त्योहारों के मौसम की शुरुआत में।
  2. यह पूरी तरह illogical और oppressive त्यौहार है। नाक से सिर तक का सिंदूर और ठंड में औरतों का पानी में खड़ा रहना मेरे दिमाग में उनपर लादा गया एक बहुत बड़ा शोषण था।

खैर, वामपंथी रिश्तेदारों के बीच पला-बढ़ा हर बच्चा ऐसा ही सोचता है। एक इंसान बनने से पहले वह communist, feminist या atheist होता है। जो इस माहौल में नहीं पैदा हुये उन्हें इस conditioning की गहराई शायद ही समझ आये जो हर छोटी-बड़ी चीज में directly या indirectly घुसी होती है।

छठ के बारे में  सालों बाद मुझे इस त्योहार में कुछ अलग चीजें दिखी –

सिंदूर लगाई शान से चलती औरत के पीछे भारी पूजा सामग्री से लदी टोकरी उठाये कोई पुरुष। उसका पति या बेटा, जो टोकरी जमीन पर नहीं रख सकता मंजिल से पहले। मैं हैरान थी कि इस पर्व में महिला शोषित है तो उसके आस-पास के पुरुष उसके कहने पर क्यों इधर से उधर भाग कर सब समान जुटा रहे हैं? क्यों इतना भारी डलिया सिर पर उठाये दो किलोमीटर दूर घाट पर जा रहे हैं?

फिर एक दिन डिस्कवरी पर मुझे दिखी Scandinavian देशों में बर्फीले पानी में नहानेे का त्योहार। औरत, मर्द, बच्चे सब अपने मन से कड़कती ठंड में नँगे बदन पानी में कूद रहे थे। सवाल आया कि क्यों इसे adventurous, daring और fun कहा जाता है, जबकि छठ को शोषण? आखिर क्यों हड्डी गलाती ठंड में नँगे बदन पानी में उतरती स्त्री empowered है, illogical नहीं। जबकि लाल-पीली साड़ी में पानी में उतरी औरत हमें बेवकूफ और पीड़ित लगती है।

फिर दिखा कि छठ मनाने वाले महीनों पहले अपने हिस्से का घाट बुक करवाते हैं। उसे लीप-पोत कर पंडाल लगाते हैं। सजाते हैं। पर आप छठ के दिन किसी के भी पंडाल में घुसकर बैठ जायें, कोई नहीं पूछता कि आपकी जाति क्या है? आप बिना जान-पहचान हमारे पंडाल में क्यों बैठे हैं? मेरी माँ किसी के भी घट में घुस जाती है। उनकी सूप सजाने और तमाम चीजो में मदद करती है। इन बतियाती औरतों को देखकर यह पता नहीं चलता कि ये आपस में सालों से दोस्त नहीं हैं। सवाल आया कि अगर यह सामाजिक बराबरी(जिसके बारे में मुझे हमेशा सुनने को मिला) की झलक नहीं है, तो फिर क्या है? क्या सिर्फ इसीलिए नहीं है क्योंकि इससे “धर्म” शब्द जुड़ गया है?


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फिर जब पिछले साल अपने साथ फ्लाइट में चढ़ते प्लास्टिक का बोरा और झोला लिये लोग दिखे। कपड़ो से पता चल रहा था कि फ्लाइट के टिकट शायद इनके एक महीने के आमदनी का बड़ा हिस्सा हो। छोटे-मोटे कामगार और मजदूर जो छठ के लिये किसी भी हालत में घर पहुँचेंगे।

दौड़ती -भागती दुनिया में ना तो अब कजिन की शादी में पहुंचने की फुर्सत है ना किसी ऐसे अन्य त्योहार में। दिवाली-होली सब घर से दूर मन रही है। ऐसे में पूर्वांचल में एक ऐसा त्योहार अभी भी जिंदा है जहाँ घर जाना अनिवार्य हो पूरे हिंदुस्तान में बिखरे हर सदस्य के लिये। त्योहार के नाम पर होती बर्बादी के बारे में बचपन से सुन रखा है लेकिन मुझे पैसे खर्च करने की इससे अच्छी अनिवार्यता और नजर नहीं आती।

हाँ, इस बात की खुन्नस है कि दीपावली से पहले तक जो टिकट चार हजार का हो वह दो दिन बाद आठ हजार का हो जाता है और हज पर सब्सिडी देने वाली सरकार इसपर कुछ नहीं करती, यह जानते हुये भी कि क्या महत्व है पूर्वांचल में इस त्योहार का।

वामपंथ से निकलकर जब मनोविज्ञान की ओर मुड़ते हुये मुझे समझ आया कि परम्परा खो देने पर आप इंसान को जोड़ने वाली सबसे अहम चीज खो देते हैं। हालाँकि आप कह सकते हैं कि परम्परा के बजाय इंसानियत ज्यादा महत्वपूर्ण है पर आप कभी उतनी फुर्सत नहीं निकाल पाते कि अपने हर करीबी से मिलने सैकड़ों मीलों का फासला तय करें सिर्फ मिलने के नाम पर। आप सिर्फ परम्पराओं की वजह से ही ऐसा करते हैं… इसीलिये कुछ परम्परायें हमेशा जीवित रहनी चाहिये।

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