शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती

शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती को नमन

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  • सोनाली मिश्रा


आपके राजनीतिक विचारों का समर्थन नहीं किया, परन्तु आपको जब जब किसी ने भी चर्बी गोला बोला, तो दिल दुखा!

शिर्डी के प्रति जो जागृति आई, और जो लोग जागरूक हुए, उसमें आपका बहुत बड़ा योगदान था!

आपको प्रणाम!

यह हम हिन्दुओं का दुर्भाग्य है कि हमारी पीठों, हमारे मठों, के विषय में हमें जानकारी बहुत कम होती है एवं हमारे धार्मिक निर्णय पीठों में न होकर न्यायालयों में होते हैं, सेक्युलर क़ानून के अनुसार! हमारे धार्मिक निर्णय हमारे मठों के पास आएं, इसका प्रयास अब हमें सभी को करना चाहिए!

दुष्प्रचार के चलते एक बार मात्र आपके प्रति मन में अजीब भाव आए थे, फिर वह भी धुल गए! यदि मैंने एक भी अच्छा कार्य किया है, तो महादेव मुझे इस कुकृत्य के लिए क्षमा अवश्य करेंगे!

स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का जन्म मध्यप्रदेश राज्य के सिवनी जिले के दिघोरी गांव में ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके माता-पिता ने इनका नाम पोथीराम उपाध्याय रखा था। महज नौ साल की उम्र में उन्होंने घर छोड़ धर्म की यात्रा शुरू कर दी थी।


चंद्र बाबू नायडू कहां हैं? याद है?

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इस दौरान वो उत्तरप्रदेश के काशी भी पहुंचे और यहां उन्होंने ब्रह्मलीन श्री स्वामी करपात्री महाराज वेद-वेदांग, शास्त्रों की शिक्षा ली। आपको जानकर हैरानी होगी कि साल 1942 के इस दौर में वो महज 19 साल की उम्र में क्रांतिकारी साधु के रुप में प्रसिद्ध हुए थे। क्योंकि उस समय देश में अंग्रेजों से आजादी की लड़ाई चल रही थी।

स्वामी स्वरूपानंद ने साल 1950 में वे दंडी संन्यासी बनाये गए और 1981 में शंकराचार्य की उपाधि मिली। साल 1950 में ज्योतिषपीठ के ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती से दण्ड-सन्यास की दीक्षा ली और स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती नाम से जाने जाने लगे।

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