किसानों का दिन

आज किसानों का दिन है…….

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किसानों का दिन : हमे ये पोस्ट आज नहीं करना चाहिए था लेकिन आज के दिन करना मजबूरी समझ लीजिएक्योंकि इन गद्दारों ने किसान जैसे अन्नदाताओं का परिभाषा ही बदल डाला है। किसानों को अभी तक कभी ये नही बोला गया था की वो आतंकी है,वो खालिस्तानी है लेकिन 2020 में सब देखने को मिला और साथ मे किसानों पे अलग-अलग प्रकार की टिप्पड़ी भी देखने को मिली।लेकिन चिंता मत करिए क्योंकि जिनके लिए ये शब्द प्रयोग किये जा रहे है वो कतई किसान नही है।

सबसे पहली बात की कृषि बिल का विरोध करने के लिए दिल्ली कूच करने वाले सो कॉल्ड किसान सिर्फ पंजाब में ही क्यों रहते है।जब किसानों के इतने सारे संगठन एकजुट हो कर आंदोलन कर ही रहे तो पूरे देश के किसानों को एक साथ दिल्ली पे चढ़ाई कर देनी चाहिए।कहा-कहा रोकती पुलिस और आज तक खास कर 2014 के बाद किसी आंदोलन को पुलिस कभी नही रोक पाई है और ये तो हमारे अन्नदाता है। किसानों के नाम पर देश मे जो बढ़ चढ़ कर राजीनीति इन दिनों हो रही है कतई सहन करने लायक नही है लेकिन मोदी जी कैसे सहन कर रहे वो तो वही जानते है।

कोरोना से कराहती दिल्ली में इन दिनों कोई समझदार किसान आना भी कैसे और क्यों चाहेगा।चुकी मैं उत्तर प्रदेश से आता हूं तो यहा पर किसान कम और समाजवादी पार्टी के टुटपुंजिया नेता किसानों का आंदोलन ज्यादा कर रहे है।

मैं मानता हूं भारत संभावनाओ का देश है,यहा कर व्यक्ति अपने स्वादानुसार हर आंदोलन में अपनी संभावना तलासता है।अभी इस कड़ाके की ठंड में दिल्ली में चल रहे आंदोलन का भी अपना ही संदर्भ है,किसानों की पीड़ा अपनी जगह और राजनीतिक गिद्धों की अपनी जगह।

मैं ही नही बल्कि पूरा भारत है जो मानता है की किसानों का कोई विरोधी नही हो सकता,उसके डर और उसकी आशंकाओं का हर हाल में निवारण होना चाहिए और जल्दी होना चाहिए।

मैं एक समय के लिए मान लेता हूं की इस बिल से किसान नाराज है या फिर उसे समझ नही आया है,पर विरोध की ये कौन सी शैली है जो भगवान राम को गालियां,भारत माता की जय और जय हिंद से आपत्ति दर्ज कराए?

मैं जानना चाहता हु की ये किसान कहा से आए है जिनका नाश्ता पिज्जा,लंच तड़का मार के दाल और खाने में बोतलों के साथ पूड़ी-पोलाव परोसा जा रहा है,बल्कि उसके बाद एंटरटेनमेंट में कोई कमी न रह जाए उसके लिए डीजे भी लगाया गया है,ना-ना ये हमारे और आपके अन्नदाता नही हो सकते। मैं तो अपने दोस्तों को तैयार कर रहा हु की चलो जहा आंदोलन हो रहा वहा चल के उसका हिस्सा बनते है और पहली जनवरी भी फ्री में एन्जॉय करते है।

मैं सीधे तौर पे बोल रहा हु की ये विरोध आप लोगो को पहचानने का समय और मौका दे रहा है,आप परेशान मत होइये बस धैर्य से देखते जाइये जैसे शाहीन बाग का फ्री वाली बिरयानी देखा था,और देखते जाइये की देश विरोधी ताकते कैसे जहर उगल रही है।

ये मोदी की कब्र खोदने वाले असल मे आपके उस भ्रम की कब्र खोद रहे है जो आपको सेक्युलर बनाए हुवे है। देश का प्रधानमंत्री चिल्ला-चिल्ला कर बोल रहा है की हम हाथ जोड़ कर किसानों के सामने झुक कर बात करने के लिए तैयार है। लेकिन…….

किसानों का दिन होने पर मैं बस यही बोलना चाहूंगा आप असली किसान को पहचानिए और किसान जैसे शब्द को बदनाम न करिए क्योंकि ये शब्द नही भारत की जान है,क्योंकि आंदोलन हमेसा नही चलेगा,सरकार या तो मान जाएगी या मना लेगी,लेकिन ये सो कॉल्ड किसानों के वजह से हमारे किसानों को बदनाम न किया जाए।2014 के बाद जितने भी आंदोलन हुवे है देश मे वो हर एक आंदोलन कुछ न कुछ सीखा गया है और ये आंदोलन भी बहुत कुछ सीखा रहा है बस नजर गड़ाए रखिये,सब समझ आएगा।

जय जवान,जय किसान

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