ध्यान

मनुष्य शरीर के सॉफ्टवेयर को दुरुस्त रखने का साधक ध्यान

प्रमुख विषय युवा
  • डॉ त्रिभुवन सिंह

 

कंप्यूटर के दो हिस्से होते हैं। एक हार्डवेयर दूसरा सॉफ्टवेयर। इसीलिये कंप्यूटर को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस भी कहते हैं। आपने देखा होगा कि कंप्यूटर को लंबे समय तक सहजता से चलाने हेतु उसके सॉफ्टवेयर को अपडेट करते रहना पड़ता है। दूसरी चीज कभी कभी कंप्यूटर में इतनी जंक इकट्ठी हो जाती है कि उसकी फॉर्मेटिंग करना पड़ता है।

ठीक इसी तरह हमारे शरीर ( हार्डवेयर ) और माइंड ( सॉफ्टवेयर ) में भी धूल धक्कड़ इकठ्ठा होती रहती है। धूल चाहे पर्यावरण से उपजी हो या विचारों के रूप में हमने एकत्रित कर ली हो।

यह हमारे शरीर और माइंड में दुर्गंध भर देती हैं।  शरीर की धूल और गंदगी तो हम स्नान करके दूर कर लेते हैं। कभी कभी इत्र खुशबू से भी शरीर की दुर्गंध को हम छिपा लेते हैं। परंतु लंबे समय तक नहीं हो सकता। स्नान करना विवशता बन जाता है। स्नान करके हम तरोताजा अनुभव करते हैं।

लेकिन सॉफ्टवेयर यदि विचारों के दुर्गन्ध से भर जाए तो उसका क्या असर होगा, इससे हम सब परिचित हैं – अवसाद तनाव चिंता बेचैनी आदि आदि।

तो फिर सॉफ्टवेयर की फॉर्मेटिंग कैसे हो, उसे कैसे अपडेट करें।  उसके लिए हमारे ऋषियों ने ख़ोजा है – अष्टाङ्ग योग। उसका सीढ़ी दर सीढ़ी उपयोग कर सकते हैं। या सीधे ही छलांग लगा सकते हैं ध्यान में। ध्यान ही वह विधि है जिससे माइंड नामक सॉफ्टवेयर को अपडेट और फॉर्मेट किया जा सकता है।


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लेकिन इसमें सबसे बड़ी बाधा क्या है? जिस तरह समुद्र मंथन शुरू करने पर सबसे पहले विष निकला था जिसने देवताओं और असुरों को बेसुध और विचलित कर दिया था, उसी तरह ध्यान में सबसे पहले हमारा सामना होता है उस विष से जो हमने अपने अंदर एकत्रित कर रखा है। वह विष सबसे पहले बाहर निकलता है और हमें विकल कर देता है। यही विष हमें ध्यान में प्रवेश करने के दरवाजे पर रोक देता है। और हम घबराकर ध्यान से भाग खड़े होते हैं।

लेकिन यह विष हमने ही एकत्रित किया है। हो सकता है कि इसके लिए हम दूसरों को उत्तरदायी ठहराते आएं हो। लेकिन हमारे अतिरिक्त कौन हमारे मन में विष एकत्रित कर सकता है।

हम जिस तरह सोचते हैं, यदि यह सम्भव हो सके कि कोई इलेक्ट्रोड हमारे मस्तिष्क में घुसेड़कर उसका सार्वजनिक प्रसारण किया जा सके, तो हममें से अधिकतर लोग विक्षिप्त हो जाएंगे, और अनेकों लोग आत्महत्या कर लें। क्योंकि हो सकता है कि हमने साधु का चोला धारण कर रखा हो आमजन के सामने, लेकिन हमारे अंदर शैतान बैठा हो, और हमारे अंदर का शैतान सार्वजनिक हो जाये। और हम नंगे हो जाएं सार्वजनिक पटल पर।

इसलिए माइंड में संकलित विष को निर्गत करने का एकमात्र साधन है ध्यान। हर संवेदनशील व्यक्ति को इसका उपयोग अपने जीवन में करना ही चाहिए।  यह हमारे सॉफ्टवेयर को तरोताजा रखेगा।

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