फौज

कोई फौज में क्यों जाता है?

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  • राजीव मिश्र 


1997 में हमारी बैच के लगभग 120 डॉक्टरों में तीन लोग शॉर्ट सर्विस कमीशन पर फौज में गए। एक अभी कर्नल है, एक कैप्टन अजय सिंह राष्ट्रीय राइफल्स के साथ सेवा में मणिपुर में वीरगति को प्राप्त हुए, और मैं सात साल पूरा करके वापस आ गया।

हम सबमें सबसे मोटिवेटेड और सेना में जाने के लिए उत्साहित कैप्टन अजय सिंह भाई ही थे। कर्नल साहब के लिए यह अच्छा करियर था। मेरे ना कंटिन्यू करने के अपने कारण थे। पर कुल मिलाकर यह कि फौज हर तरह की विचार प्रक्रिया को समाहित कर लेती है।

जो बहुत मोटिवेटेड हैं उन्हें सर आंखों पर बिठाती है, जो इसमें अपना फायदा देखकर आते हैं उनसे भी अपना काम निकाल लेती है। और जो आने के बाद छोड़कर जाने की सोचते हैं, जबतक हैं तबतक फौज उनसे भी काम ले लेती है। फौज के भीतर फौज की वर्दी पहन कर आप मनमानी नहीं कर सकते।


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आप यह कह सकते हैं कि मैं ऑलरेडी डॉक्टर था तो मुझे निकल कर आने में कुछ सोचना नहीं था. यह सच नहीं है। मैं सात साल फौज में रहा तो अपने समकालीनों से करियर में कम से कम सात साल पीछे हो गया।

मेरे सहपाठी एमडी, डीएम कर चुके थे, सीनियर रेजिडेंट थे. मुझसे जूनियर्स अब सीनियर्स हो गए थे. मुझे उनसे कैचअप करने में बहुत समय लगा। सच कहूं तो इंग्लैंड आकर ही कैचअप कर पाया, या अभी भी नहीं कर पाया लेकिन जब फौज में गया तो अपने कैलकुलेशन से गया। जब छोड़ा तब भी अपने रिस्क पर छोड़ा।

सेफ्टी और सिक्योरिटी को टॉप पर रखने वाले मित्रों और परिवार के सदस्यों ने मुझे ज्वाइन करते समय भी रोका और छोड़ते समय भी मना किया।

आज चाहे गणित लगा लूं कि फौज को शॉर्ट सर्विस के लिए ज्वाइन करने में क्या नुकसान हो गया, पर जब ज्वाइन किया था तो यह मेरा बेस्ट ऑप्शन था।

हालांकि मैं कैप्टन अजय की तरह एक मॉडल फौजी नहीं था पर कुल मिला कर मुझे फौज से बहुत कुछ मिला जिसका मूल्य पैसे में नहीं लगा सकता। मैं फौज में एक अक्खड़ कॉलेज पास आउट बैचलर की तरह गया था और एक आदमी बन कर निकला।

अगर फौज में ये युवा चार साल के लिए भी जायेंगे और एक जिम्मेदार नागरिक बन कर निकलेंगे तो इसका मूल्य एक सिविलियन माइंडसेट से लगाया ही नहीं जा सकता।

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